जीने की लत

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    merapitara
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    वो दिन भी थे तब मेहरबान इस कदर,
    जब राहों के पेड़ करते थे बाहें फैलाये स्वागत,
    मुस्कुराते थे वो रास्ते लिखते हुए दावतनामे,
    उस ठंडी हवा की छुहन लगती थी गुदगुदाने|

    घंटो सोच के सागर में खाते थे तब गोंते,
    बिन बात के भी हम थे मंद मंद मुस्कुराते,
    सूरज की किरने लगती थी नर्म और वो चांदनी जवां,
    टिमटिमाते तारों से उन दिनों हम जलाते थे दिल की शमां|

    मन करता था की अब तो जीना भरपूर है,
    यह एक चाहत से ज्यादा अब बना एक फितूर है,
    खुले कानों से भी अब मौत की आवाज की अनसुनी,
    हो गई थी आदत, लग गयी थी मुझे लत जीने की|

    जब उमंग भी थक कर बैठ गयी थी रास्ते पर,
    रौशनी ने भी हाथ झटक कर छोड़ दिया था अकेला,
    तब खेले हम उस रात के खामोश अंधेरो की गोद में,
    सुबह उठ सूरज पर सवार चले नयी मंजिल की तलाश में|

    आँखें बोझिल नहीं होती थी उन सपनों के भार से,
    ना ही होती उम्मीदें चकनाचूर मायूसी की टकरार से,
    हालातों ने हमें जब सिखा दी थी तरकीब गम पीने की,
    हो गई थी आदत, लग गयी थी मुझे लत जीने की|

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