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उनके अपने डर

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जीता मरता रोज यहां, जीवन उसका ताप

मजदूरों की पीड़ा को , नाप सके तो नाप

उनकी अपनी थी शंकाये, उनके अपने डर

तू अपने हर सपने को , निर्भयता से भर

दिखती दूर तक मरुधरा, दिखती दूर तक रेत

गिरकर उठता रोज यहाँ, टपका जिसका स्वेद

जितने भी थे लौट गये , अपने अपने घर 

सूरज उगता अस्त रहा ,उसका तेज प्रखर

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