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गांव तेरा

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चल अब इधर आ जा, उधर धूल बहुत है,

उधर होंगे सोने चांदी के महल शहर में,पर इधर तेरे बगीचे में फूल बहुत है ।

अरसा हो गया तुझे तेरा गांव छोड़े,पलट के अब हाल भी नही लेता तेरे बगीचों का,

लगता है भूल गया तू घर से थोड़ी दूर पे जो एक कच्चा रास्ता था,

और उन रास्तो पे बिखरी पड़ी अनगिनत यादे जिनसे तेरा वास्ता था।

वो कल्लू कुम्हार का सरपट घूमता चाक जिसपे बनते मिट्टी के बर्तन विस्मय की लकीर छोड़ते जाते थे,

कि कैसे कच्ची मिट्टी के सुंदर दिए बने जा रहे।

वो मंदिर के रास्ते पे पड़ने वाले छोटे छोटे पानी के तालाब,

और तालाब में उगते कमल जो मानो हिंदी की कहावत को चरितार्थ कर रहे थे,

हां कमल कीचड़ में ही तो खिल रहा था।

याद है वो सुनसान पड़े पुराने मकानों के खंडहर,

वो अब भी वैसे ही है, कुछ भी बदलने नही दिया उन खंडहरों ने,

वो जीर्ण हालात, वो वीरान अहाते में लंबी लंबी घांस,वो टूटे फूटे कमरे,

सब कुछ वैसे का वैसा ही सहेज के रखा है इन खंडहरों में,

यंहा तक कि अपनी दीवारों में कुरेदे गए तुम्हारे नाम को भी संजो के रखा है इन खंडहरों ने।

पर शायद तुम भूल गए इसीलिए तो कभी आते ही नही इधर इनका हाल जानने को,

देख लो थोड़ा वक़्त जो मिल जाए आके एक बार उन यादों को ढोती इन आखिरी निशानीयो को,

क्योंकि सुना है वक़्त बदलने वाला है, गाँव भी अब शहर बनने वाला है !

जो इस बार तू नहीं आएगा, तो यकीन कर बचपन का कुछ भी नहीं पाएगा.

©अभिनव श्रीवास्तव

One Comment

  1. KUSUM MADHUKAR GOKARN says:

    Abhinav ji
    Teesri Kavita.
    Bahut achhi hai.
    Aap ne Gaon aur Sheher ki tulana theek likhi hai.

    Magar gaon bhi jaldi se badal kar sheher jaise hone lage hai.
    Gaon mein jabse Tractor aur Bijli, Tv aur Mobile aa gaye hain,
    Yeh parivartan hota hi rahega.
    Kusum

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