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नूतनता

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पतझड़ में पत्तों का गिरना ,

शाखाएँ सूनी कर जाना ,

खड़खड़ पत्तों का कोलाहल ,

अंतर्मन विचलित कर जाना |

 

तब अडिग साहसी बन जाना ,

नीरसता तज कर्मठ बनकर ,

नूतन परिवर्तन ले आना ,

जीवन-वन के हे! कल्पवृक्ष |

 

शाखों से गिरते पत्तों का मत शोर सुनो ,

सूखे झड़ते पत्तों का मत शोक करो ,

भीतर के झंझावातों से मत उलझो ,

बन कल्पवृक्ष नव-पल्लव का आह्वान करो |

 

कर्तव्य तुम्हरा जीवों को आश्रय देना ,

नन्हीं चिड़िया के लिए नीड़ निर्मित करना ,

कर त्याग पुरातन नूतन का निर्माण करो ,

बन कल्पवृक्ष नव-जीवन का संचार करो |

 

गिरते पत्तों का कोलाहल ,

सूखी शाखा की नीरवता ,

कितने दिन रहती है जीवित ,

विजयी होती है नूतनता |

 

सूखी शाखों का आलिङ्गन ,

जिस दिन नव-कोपल से होगा ,

पत्तों के झुरमुट से जिस दिन ,

नव-खग चीं चीं कर बोलेगा ,

जिस दिन चिड़ियों का मधुर गान ,

नीरवता को झकझोरेगा ,

उस दिन पतझड़ का कोलाहल ,

परिवर्तित सुर में बोलेगा |

 

रूचि मिश्रा

3 Comments

  1. Kusum says:

    Cycle of birth and rebirth expressed beautifully . Congrats.

  2. sonal says:

    Well expressed poem.

  3. kusum says:

    ‘Ring out the old.
    Ring in the new’
    Well put in your new words comparing life’s re-cycle to old leaves falling and making place for new fresh ones.
    Very good.
    Kusum

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