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गुस्ताखियाँ

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गुस्ताखियाँ बस किये जा रहा हूँ
नहीं भूलने की सज़ा  पा रहा हूँ
टिका चंद वादों पे लाचारगी  उफ़
न सुनने रहा  कुछ न कहने बचा कुछ

ग़ज़ल हार लब्जों में सोई थकी बस
बयां हाल अपना किये जा रहा हूँ
परिंदे चहकते कहां चल उड़े क्यूं
ठगा आसमां मैं तका जा रहा हूँ

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