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तनहा

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Hindi Poetry, Uncategorized

नए पौधे सा सा लगता है कभी-कभी तनहा हो जाना खुद का
अपेक्षाएं, आशाएं और पराधीनताएँ कम हो जाती हैं
हाँ.. भावनाएं आषाढ़ के बादलों की तरह उमड़ती हैं फिर,
इन्ही मकड़जालों के बीच जन्म लेती हैं एक एहसास
स्वयं के हो जाने का ….
अपनेआप का हो जाना भी पूर्णता से परिचित होना है
”एकमात्र” होना हर कोई होने से बेहतर है!

2 Comments

  1. Kusum says:

    I suppose this poem is in support of one’s individuality and personal uniqueness.
    Each person has a special identity of his or her own.
    I support your view.
    Well expressed.
    Best wishes, Kusum

  2. Narayan Singh Chouhan says:

    बेहतरीन Pallawwi ji

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