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हे ! पथिक तू जा ठहर

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Hindi Poetry, Uncategorized

रोशनियों से नहाया और कहाया एक शहर

गाँव तो कई डूब गए फिर बही है एक नहर

आग सी लगने लगी है ये भयानक सी खबर

दर्द से निकली है चींखे दंगो का है यह कहर

जिंदगी मुश्किल हुई अब है दुखी है हर पहर

स्कूली बच्चों ने पाया रोटी सब्जी में जहर

अब घटाए घिर रही है हे ! पथिक तू जा ठहर

हौसलो ने घर बनाया हौसलो से है शिखर

लौट आई गर्मिया है गर्म लू से मत बिखर

यह नदी जो भा रही है इस नदी में है भंवर

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