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मेरा सच, मेरी सचाई

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यह सच है कि मुझे मुहबत बेइंतिहा है
वह जानती है की मैं आशिक़ निराला हूँ
कैफियत मेरे जूनून-ो-इश्क़ की
उस ने अहसास पहले कभी न की होगी

यह भी सच है की मैं इंसानियत पसंद हूँ
जींस के हम-दर्ज़े का पुजारी हूँ
उस की पसंद और चाह मुझे अज़ीज़ है
और उसकी खुद-मुख्तारी की कदर है

यह सच है कि मैं औरों सा नहीं हूँ
इस का मुझे अंदाज़ है और नाज़ भी
मुहबतों में जीता हूँ, मुहबत ही करता हूँ
अपने आदर्शों से भी बेइंतिहा मुहबत करता हूँ

वह शख्स महज़ एक खुआब सा बन गया
मेरी जीस्त में धुंधला सा होता चला गया
यह सच है की मैं बेइंतिहा मुहबत करता हूँ
और यह भी कि मैं उस की मर्ज़ी की कदर करता हूँ

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