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आशिक़ी

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इस दौर में वो ही आशिक़ी मेहफ़ूज़ रखते हैं

जो इश्क़ और हवस में इम्तियाज़ समझते हैं

हुस्न की कदर-शान्सी भी इबादत है

ज़र्रे-जर्रे में ख़ुदा दिखना भी आशिक़ी है

 

*****विकास राय भटनागर*****

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