« »

ग़ज़ल ए Jaundice

0 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 5
Loading...
Hindi Poetry

आँखों का मौसम देखो कैसा ज़र्द हो रखा है
मर्ज़ ए जिगर, बदन ओ सर में दर्द हो रखा है

हफ़्ते भर से दौड़-भाग की धूल से जिस्म बरी
मन कैसा ये घर के अंदर भी ग़र्द हो रखा है

मिज़ाज फ़िज़ा के, पल में तोला पल में माशा
हवा का चलन गर्मतर कभी सर्द हो रखा है

बाहर का ज़्यादा खाया-पिया कम है घर का
तबियत में ये सब पलटकर बे-पर्द हो रखा है

अंदर से खा जाए जो ज़ंग तो अंग क्या लोहा
कहने को तो आदमी हर एक मर्द हो रखा है

आँखों का मौसम देखो कैसा ज़र्द हो रखा है
मर्ज़ ए जिगर, बदन ओ सर में दर्द हो रखा है

~ मरीज़ ए सब्र

Jaundice

Jaundice

Leave a Reply