« »

दोज़ख़

0 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 5
Loading...
Uncategorized

बड़ी दोज़ख़ में है वास्ता ऐ जिंदगी
की जबसे राब्ता ऐ खुदा टुटा है

दरिया ,जमीं पहाड़ो- पेड़ जहा से
गुजरी हूँ खुदा बोला ”सब मेरा हैं ”

अब नज़र को क्या दिखाऊ, वादियां ये उसकी है
जिस्म को क्या पिलाऊँ, हवा में व् खुश्की है

दोज़ख़ ही दोज़ख़ है भीतर और बाहर

की आरजू हुई मिटा दू ये जिस्मोजां
खुदा हंसा बोला खुद पे कब अख्तियार तेरा है

Leave a Reply