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फागुन की मस्ती छाती है

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गौरव ग्रन्थ

जीवन की आपा धापी में
अब वक्त कहा मिल पाता है
फागुन की मस्ती छाती है
मन मन ही मन कुछ गाता है

है सहज सरल से तरल नयन
मौसम में रंगत आई है
बच्चो की शक्ले निखर रही
बस्ती ने रौनक पाई है
संसार सगो का मैला है
इंसान अकेला ही जाता है

यहाँ बदन गठीला मोहे मन
सुंदरता सबको भाती है
भीतर जो होती कोमलता
ओझल होकर रह जाती है
मानव मन का यह दोहरापन
सौंदर्य कहा रख पाता है

यहाँ समय सदा ही सपनो सा
खुश किस्मत ने ही पाया है
दुःख सह कर भी मद मस्ती का
यहाँ रंग कही गहराया है
सुख की है छाँव नहीं आती
सुख सपनो का कब आता है

One Comment

  1. Vishvnand says:

    (Y) सुन्दर संवेदनशील रचना
    मनभायी
    Commends ….! {)

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