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युध्दरत हर बोध है

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Hindi Poetry
आंधिया उठते बवंडर  मार्ग पर अवरोध है 
दर्द से गमगीन चेहरे   युध्दरत हर बोध है 
 
 
द्वेष की परछाईयाँ है  मन में पलते द्व्न्द्व है 
बारूदी होती है खुशिया    हो रही हुड़दंग है 
आस्था घायल हुई है  दीखता प्रतिशोध है 
 
 
माटी से होती बगावत  कौनसा प्रतिकार है 
राष्ट्र भक्ति क्षय हुई है  उन्हें जय से इनकार है 
सत्य से भटके विचारक लक्ष्य विचलित शोध है 
 
 
भ्रम है फैला मन विभञ्जित क्लांत सी तरुणाई है 
वृक्ष पर फल है विषैले  विष फसले पाई है 
शिक्षा से होते  शिक्षित  दीक्षित नहीं यह पौध है
 

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