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कलियां चुपके से चटकीं हैं

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Hindi Poetry

मुद्दे से भरसक भटकी है।
बहस कुतर्कों पर लटकी है।
कभी व्यक्तिगत वार हुये थे
अब भी बात वहीं अटकी है।
धारा भले लगे गंदलाई
मगर गंदगी ये तट की है।
भले रहे बेख़बर बाग़बां
कलियां चुपके से चटकीं हैं।
कहीं बुलेट तक पहुंच न जाये
ये जो लड़ाई बैलट की है।
काम कभी सीधे न करे वो
क्या कुछ टेढ़ बनावट की है।

3 Comments

  1. Reetesh Sabr says:

    हमेशा की तरह कसा हुआ मंजा हुआ सिद्धनाथ कलाम 🙂

  2. siddhanathsingh says:

    thanks.reetesh ji

  3. Vishvnand says:

    Vaah vaah bahut badhiyaa ….!
    commends …!

    Kuch bhii kaam n hone paaye
    sanasad me bas udham machaayen
    Desh ye chaahe jahnum jaaye
    nazar vote par hii atakii hai ….! 😉

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