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कब तलक ख़्वाबों से हम बहला करें

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Hindi Poetry

फ़िक्र बदख़्वाहों की इतनी क्या करें।
वो तो दुनिया का बुरा सोचा करें।
तुम नहीं चाहो हमें चाहे सदा,
हम तुम्हें, या रब, सदा चाहा करें।
आ हमारे घर रहा है आज वो
सूझता ही है न हम क्या क्या करें।
दिल की उसको क़द्र धेले भर नहीं
कैसे उससे दिल का हम सौदा करें।
दूसरों की क्यों हैं कमियाँ ढूंढ़ते,
खूबियाँ ख़ुद में न क्यों पैदा करें।
आ कभी इनकी कोई ताबीर कर,
कब तलक ख़्वाबों से हम बहला करें।

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