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अपनी तो ताफलक़ उड़ानें हैं।

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Hindi Poetry

अपनी तो ताफलक़ उड़ानें हैं।
उतनी ऊँची कहाँ मचानें हैं।
ख़त्म दौरे ख़िजां न होता है
और हमें गुल नये खिलाने हैं।
उनसे ये मसअला न हल होगा
वो ज़रा ज़्यादा ही सयाने हैं।
किसने बिजली से मुख़बिरी की है
किस जगह अपने आशियाने हैं।
पार शायद कि हम भी हो जायें
आजकल बह रहे बहाने हैं।

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