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बोलते पलों का घर …..

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Hindi Poetry

बोलते पलों का घर …..

हमारे और तुम्हारे बीच
कितनी मौनता है
एक लम्बे अंतराल के बाद हम
एक दूसरे के सम्मुख
किसी अपराध बोध से ग्रसित
नज़रें नीची किये ऐसे खड़े हैं
जैसे किसी ताल के
दो किनारों पर
अपनी अपनी खामोशी से बंधी
दो कश्तियाँ//

कितने बेबस हैं हम
अपने अहंकार के पिघलते लावे को
रोक भी नहीं सकते//

चलो छोडो
तुम अपने तुम को बह जाने दो
मुझे भी कुछ कहने को
बह जाने दो
शायद ये खारा पानी
हमारी मौनता को स्वर दे दे
अंतर्मन की गहन कंदराओं में व्याकुल
मौन भावों को
जीवन रागिनी से झंकृत
बोलते पलों का घर दे दे//

सुशील सरना

4 Comments

  1. Panna says:

    ahasaaso ko nichod diya he aapne apni kavita me…great poem..especially last few lines.. Please read my poems at saavan and make your precious comment…here is the link http://saavan.in/user/panna

  2. Vishvnand says:

    Sundar abhivakti
    kavitaa man bhaayi
    ahankaar kii karanaa bidaaii
    iseeme hee hai apanii bhalaaii …!

  3. SN says:

    Achchhi kavita. kintu maunata ko maun hi likhen to theek rahe,maun svayam poorn shabd hai.

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