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ज़मीं पर जीने की …***

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Hindi Poetry

ज़मीं पर जीने की …

ज़मीं पर जीने की
ये शर्त हुआ करती है
ज़िंदगी अपने पैबंद
खुद सिया करती है
ये खुद ही जिया करती है
और खुद ही अपनी अज़ल की
ज़िम्मेदार हुआ करती है
कभी स्याही के लिए जीती है
कभी सहर के लिए मरती है
ये सांस सांस चलती है
और सांस सांस ढलती है
रिश्तों के पन्नों में
अपने अस्तित्व के लिए लड़ती है
जाने किस मिट्टी की बनी है ज़िंदगी
कभी थकती ही नहीं
बस चलती ही रहती है
जलने से पहले भी
और जलने के बाद भी
जन्म दर जन्म
निरंतर
अवरिाम
ये चलती ही रहती है

सुशील सरना

2 Comments

  1. santosh bhauwala says:

    jami par jeene ki ye shart hua karti hai
    jindagi apne paiband khud siya karti hai

    bahut sunder ,pure jeevan ka saar !!

    santosh bhauwala

  2. sushil sarna says:

    thanks a lot aadrneey Santosh Bhauwala jee for ur so sweet comment

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