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घर मेरा बिलआख़िर ये बाज़ार बना देंगे

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Hindi Poetry

घर मेरा बिलआख़िर ये बाज़ार बना देंगे
हर शै को बिकाऊ ये अय्यार बना देंगे

रिश्तों को बना देंगे हद दर्ज़ा वो बेमानी
हर शख़्स के सीने में दीवार बना देंगे

जज्बात की नर्मी को बतलायेंगे कमज़ोरी
अहसासे मुहब्बत को आज़ार बना देंगे

तारी है हुआ क्योंकर ये मौत सा सन्नाटा
कहते तो थे गुलशन को गुलज़ार बना देंगे

खेलों में भी बच्चों के बन्दूकें हुईं शामिल
मासूम सा बचपन वो ख़ूंखार बना देंगे

जीना भी हुआ बिल्कुल है जद्दो जहद जैसा
तय मान लो सबको ये बीमार बना देंगे

2 Comments

  1. Reetesh Sabr says:

    मुक़र्रर मुक़र्रर अशआर सारे, ग़ज़ल में सजे हैं मेआर सारे!

  2. Vishvnand says:

    Sundar, arthpoorn, manbhaavan ….!

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