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“स्वप्न फूलों के कुचल कर तुम भूल गए!

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Hindi Poetry

स्वप्न फूलों के कुचल कर तुम भूल गए
पेड़ों के सीने में भी जीने का जज़्बा था
यूँ बेघर कर जाने किस ख़ुशी से फूल गए
दिल झाँक न देखा जो प्यार का क़स्बा था

कुछ बूँदें उस प्यार की गिरनी ही थीं
चाहे क्रोध कर पड़ो या, डालो अवरोध
उगने को फिर से उन्हें काफ़ी इतना था
समीर सुगंध से नहीं अछूती प्यार की पौध
जब काटी शाखाएं केवल नफ़रत के शूल गए

स्वप्न फूलों के कुचल कर तुम भूल गए…

जैसे हृदय तुम्हारा वैसी ही वो धड़कन थी
साँसों को रोको इक पल, देखो निर्बोध
पंछी की उड़ान का ये भी इक सहारा था
माँ की ममता से न कम ये मिट्टी की गोद
जब हड़पीं ये हवाएँ केवल हैरत के उसूल गए

स्वप्न फूलों के कुचल कर तुम भूल गए…

फिर खड़े बन विजयी स्तम्भ पैर पड़ी हार थी
अश्रु पोंछ लो कोंपलों से, करो आमोद
फूल तुम्हारे ही रहेंगे कुछ न हमारा था
हाँ व्याकुल हैं करने को फिर तुम संग विनोद
जब भूलीं दुआएँ केवल बेग़ैरत से बबूल गए

स्वप्न फूलों के कुचल कर तुम भूल गए…

~ रीतेश खरे ‘सब्र रीत जबलपुरी’

(पर्यावरण दिवस पर, एक भाव पूर्ण अभिव्यक्ति, स्मृति वीथिका से)

One Comment

  1. pabitraprem says:

    यह कविता पढ़ी.हालांकि भाव अव्यस्थित, कुछ बिखरे से हैं लेकिन कोशिश अच्छी है.कोई साथ अच्छा मार्गदर्शक और सुपठ
    मित्र हो तो पहले ही पढ़-सुनकर संपादित करने की वृत्ति रखें. शुभकामनाएं.
    -प्रेम

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