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नसीब बोल भला कब तुझे सँवरना है

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Hindi Poetry

अजाब कितने हैं जिनसे अभी गुज़रना है
नसीब बोल भला कब तुझे सँवरना है

सरे जहान फिरो बाँटते हुये खुशियां
न सूदमन्द मेरे दुख को याद करना है

ख़ता यही कि किया इन्तख़ाब है उनका
सो ख़ामियाजा हमें सारी उम्र भरना है

करें निसार तुम्हीं पर न ज़िन्दगी क्यूं हम
सफ़र हयात का आख़िर तो ये ठहरना है

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