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ज़िन्दगी से गुफ्तगू

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Hindi Poetry

ज़िन्दगी से मैंने पूछा
किस ओर तू है चल पड़ी
बहती है पानी सी
या मौजों की तू हो चली

मुस्कुरायी ज़िन्दगी ये कहकर
ना पानी ना मौजें
हूँ मैं अपने मंन की रानी
जिस ओर मेरा जी चाहे
रचती हूँ वहीँ
एक नयी कहानी
ना आऊँगी हाथ किसी के
जो चाहे जितना ज़ोर लगाए
ना मानूँगी कहना किसी का
जो चाहे माथा पीट मर जाए

मैंने भी नम आँखों से कहा
ऐ कहकशा
तेरा नशा मुझे हुआ नहीं
है साँस लेना ज़रूरी
पर वो भी अब होता नहीं

4 Comments

  1. Sabr Reet Jabalpuri says:

    अभिव्यक्ति और मर्म तो सुंदर और दार्शनिक है, थोड़ा शिल्प पर और काम किया जाए तो अक्षरश: ‘विजेता’ कहलाए!

    वैसे मैं भी कोई विशेषज्ञ नहीं, बस क्षमतानुसार व्यक्त किए जो विचार उभरे कविता पढ़ के…:-)

  2. Vishvnand says:

    Vaah vaah sundar abhivyakti
    rachana ke liye badhaaii ….!

    jindagii me jindagii ko samajhanaa nahiin hai aasaan kaaj
    kal jaisaa kuch samajh rahaa thaa nahiin hai vaisee aaj …!

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