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वो..और उसकी उम्मीद

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Hindi Poetry

वो दिनों-महीनों-सालों से इस उम्मीद में है
कि लाज-वाज छोड़, बड़े नाज़ से
कहती फिरे कि वो…उम्मीद से है…

मगर रब है रूठा सा
या कि रग में झूठा सा कोई दिलासा है,
आसा के खोल में छुपी निर्दयी निरासा है..
माह दर माहवारी जो कि कोख लिए नारी
लापता, बेनिशां…करे पाँव नहीं, दाँव भारी!

जिस आब से पेश नहीं कोई भी विशेष आए
दो-चार बूँद उसकी, अपनी एहमियत पे
क्षण भर, अति-इतराए..

पचासवी दफ़े, उस पचास के नोट के
पैमाने का रंग फीक़ा हुआ..
ज्यूं हिला-हिला के घुले क़ुनैन गोली
यूँ हलाहल पल जी का हुआ..

वो आज भी, आगे भी इसी उम्मीद में है
कि नाज़ से, दावे से कहती फिरे कि वो
वाक़ई उम्मीद से है…

~सब्र रीत

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