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ग़ज़ल…आँसुओं को!

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Hindi Poetry

फिर किस ने जगा दिया है आँसुओं को
क्यों बच्चों सा रुला दिया है आँसुओं को

थक गई आँखें तो कांधों पर आ हैं झुकी
चूम के पलकें सुला दिया है आँसुओं को

दिल सपनों के खेल रहा था रात खिलौने
तोड़ के शीशा बहा दिया है आँसुओं को

साग़र के सीने में फिर इक बेचैनी है आज
हम तो समझे थे भुला दिया है आँसुओं को

काम नहीं आया जो सब लिखना-पढ़ना
चुप-चाप ही ढुला दिया है आँसुओं को

3 Comments

  1. Vikesh Khare says:

    Bahut hi zyaada sahi!!!

    last waale sher ki pehli line mein Sabr hota to bhi achchha lagta na…

  2. Vishvnand says:

    Vaah vaah,sundar
    rachanaa ne bahut bhaavniktaa se sajaayaa aur bahaayaa hai aansuon ko ….!
    Hardik badhaii …!

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