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निहारते हुए शाम का मोड़

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Hindi Poetry

ऊँघते ख़्यालों को
हल्की सी एक दी थपकी
अनमने से मन को
आ रही बिरहन झपकी
सुध तो उसके साथ गयी
दुबकी बैठी आँखों में
चेहरे पे फिक्रों के नक्श
आते जाते कितने रक्स
पर जो मैंने लिख भेजा
मुस्काँ दबा उसने सहेजा
उम्मीद है कुछ सुस्ताती हुई
शाम मिली
बेसाख़्ता दबी मुस्कान सही
नाम खिली
निहारते हुए शाम का मोड़
रात आ गयी अँधेरा ओढ़
अब कई चेहरे होंगे ओझल
बस सगेपन की चहलपहल
मन में रखी नाम की रौशनी
दिखूँ बन के बारीक़ चाँदनी
रखा इतना यक़ीं जोड़जोड़
निहारते हुए शाम का मोड़!

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