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ख़ुश रहो मेरे वाट्सएपियो!!!

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Hindi Poetry

मैं किसी से भी ख़फ़ा नहीं हूँ …
मैं किसी से भी ख़फ़ा होऊँ भी तो
कैसे और क्यूँ ?

कि जब पड़ता नहीं फ़र्क़ आज की
बेपरवाह और बेसब्र दुनिया के
अज़ीमों और अज़ीज़ों को भी

मैं उनके बीच था जब,
तो होता ही रहता था, ख़ुश भी खफ़ा भी
मैं न रुकता था, न छिपा था बस कि
होता रहता था दिल से बयां भी

कभी-कभी किसी भूले भटके
नज़रे करम से,
अपने वजूद की ख़बर मिल
जाया करती थी मुझे

मगर अब क्या ख़बर, खलती भी होगी
किसे ग़ैर~मौजूदगी मेरी…

यूँ मेरा हर बात, हर मौक़े पे कुछ सोचना
कहना और गौर की ख़्वाहिश करना
न मिलना तवज्जो, तो शिकवा करना
ख़फ़ा भी होना..

क्या ये सब किसी को याद भी आता होगा?
अरे नहीं इन फ़िज़ूल ख़्यालात पे कौन
क़ीमती वक़्त गँवाता होगा..

वाट्सऐपाने ज़माने में,
न मौजूदगी के मानी हैं, न ग़ैर-मौजूदगी के
बस इतना भी काफ़ी है कि,
रोज़ ए पैदाइश (birth day) को
भूले न भुलाए जाएंगे हम

ख़फ़ा होके भी अब वो ख़ुशी
मिले न मिले
तो ख़फ़ा होएँ भी क्यूं और क्यूँ
रखें शिकवे गिले…

इस मर्ज़ ए लिखाई की
दुहाई थी कि
पहले का लुत्फ़, अब वहाँ तो मिलता नहीं..
तो यहाँ ही सही…

ख़ुश रहो मेरे वाट्सएपियो!!!

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