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वक्त छलावा

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Hindi Poetry

खाली बैठी मैं बस तकती चहु ओर
टटोलती दिन-रात, शाम और भोर
कब वक्त हाथ आए, लिखूं मैं कुछ और
खाली हूँ हर पल,
पर हर खाली पल के रुझान कई ओर
अनगिनत तहों में
दब सी गई है मेरे शब्दों की डोर|
जो अक्षर इक लिखूं
एक आवाज़ है कानों में पड़ती
“कहाँ हो, मुझे छोड़ कहाँ हो जाती”
हड़बड़ा, मैं कलम छोड़
फ़र्ज़ो की तरफ़ मुड़ जाती
उंगलियाँ बर्फानी सी हो जातीं
क्या लिखूं,कहाँ लिखूं
स्मरण कुछ न आवे
बस यहाँ बैठूं, वहाँ बैठूं
पर वक्त हाथ न आवे|

6 Comments

  1. sushil sarna says:

    वाह प्रमिला जी वाह बहुत दिनों के बाद आपको वाल पर पढ़ा … एक सुखद अनुभूति हुई … सही बात है कर्तव्यों की दौड़ में कभी कभी इंसान इतनी दूर हो जाता है की छूटे शब्दों को फिर से एक तार में बांधना मुशिकल हो जाता है। लेकिन जैसे ही उसको थोड़ी सी फुर्सत मिलती है मन का पंछी पुनः अपने सृजन के धरौंदे को सजाने लग जाता है। बहरहाल आपकी इस आंतरिक मनोवेदना को दर्शाती प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई. .

    • parminder says:

      Thank you Sushil ji. But I am Parminder, not Pramila 🙂
      well, last few years were mostly lived for mataji who was bed ridden, and nothing else, so mind did try to look for diversions, succeeded sometimes.

  2. sushil sarna says:

    sorry Mam, it is by mistake….and be sure the above comment is for Parminder not for pramila.Please don’t take it otherwise.thanks

  3. Vishvnand says:

    Elegant indeed you have captured in lovely words of poetry
    This fragmentation of mind between our likes & the call of duty
    Passion for poetry a Godsend boon & a loving release in this quandary ….!

    Hearty Kudos for this beauty ….!

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