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ज़िन्दगी ने इम्तिहाँ अक्सर लिए

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Hindi Poetry

ज़िन्दगी ने इम्तिहाँ अक्सर लिए
हमने भी पंगे मगर जी भर लिए

हमने तय कीं दुपहरें तपती हुई
मन में शामे सर्द का मंजर लिए

ज़िन्दगी भर हम रहे ख़ाना ब दोश
घूमते थे बोरिया बिस्तर लिए।

उम्र गुज़री तब पता जाकर चला
आस्तीनों में रहे विषधर लिए।

बेच ही पाये न हम अपना जमीर
बुद्धिमानों ने बड़े नंबर लिए।

युद्ध का परिणाम होता और क्या
घूमते तलवार थे क़ायर लिए।

सरसराहट साँप सी उनमे रही
वो रहे होठों पे हरदम “सर” लिए।

काटने को खेत तब सौंपे गए
जब मवेशी गाँव भर के चर लिए।

आप अब चारागरी को आये हैं,
मरनेवाले तो कभी के मर लिए।

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