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मृगया पर महराज हैं निकले।

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Hindi Poetry

मृगया पर महराज हैं निकले।
बहुत दिनों पर आज हैं निकले।

पशुप्रेमी का ओढ़ लबादा
लिए नया अंदाज़ हैं निकले।

खा फरेब जाएँ न परिंदे
बने कबूतर बाज़ हैं निकले।

तीरों पर फुलहार लपेटे
सारे तीरन्दाज़ हैं निकले।

रोग न गर, रोगी समाप्त हो
अच्छा लिए इलाज़ हैं निकले।

बनवासी अब ख़ैर मनाएं
बन सेवक, बनराज हैं निकले।

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