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देखो तो क़िस्मत का निराला खेल

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Hindi Poetry

देखो तो क़िस्मत का निराला खेल
पटरी बिठा के चले रिश्तों की रेल

जीवन के सह यात्री दिन औ’ रात्रि
तन से जुड़े प्रचुर मन से लेशमात्रि
अर्थ खोजते चले भले मिले बेमेल

देखो तो क़िस्मत का निराला खेल
पटरी बिठा के चले रिश्तों की रेल

प्रश्नों से घिरी रही सदा ही नैतिकता
चूंकि समाज की रीत बस भौतिकता
गाड़ी ख़िंचती चली यूँ ही ठेल ठेल

देखो तो क़िस्मत का निराला खेल
पटरी बिठा के चले रिश्तों की रेल

दावे पे दावे हैं भुगतान किए जाओ
जीवन बीमा है मर-मर जिए जाओ
क़ीमत प्रीमियम भरो हुए बिना फेल

देखो तो क़िस्मत का निराला खेल
पटरी बिठा के चले रिश्तों की रेल

~सब्र रीत

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