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इन्सान पर रहा क्या मालिक़ न तेरा बस है

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Hindi Poetry

तेरी बनाई दुनिया होती तहस नहस है.
इन्सान पर रहा क्या मालिक़ न तेरा बस है

होते हैं नित धमाके, मासूम रोज़ मरते –
और मजलिसे दिफ़ा में ज़ारी फ़क़त बहस है। majlise difa-security council

बारिश न करते बादल, इन्सां क़हतज़दा हैं qahatzada-stricken with famine
बेख़ौफ़ बम मुसलसल नभ से रहे बरस हैं.

जालिम के हाथ थामें इसकी न कोई कोशिश
सबको कि जैसे जकड़े बेकार पेशो पस हैं. pesho-pas-aaga peechha sochna

अपने मफ़ाद सबकी इंसानियत पे भारी
बैठे नज़र घुमाए हर ओर बुल हवस हैं mafad-vested interest,bul havas- one who is attracted by petty allurements

है हर नज़र सवाली क्या जश्ने ईद है ये
जैसे थे रोज़ रहते हालात जस के तस हैं

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