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बहुत हो रहे मेहरबां वो शहर पर

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Hindi Poetry

इसी यत्न में मैं रहा नित्य तत्पर
बजूं बांसुरी सा तुम्हारे अधर पर

ख़ता बस वही एक अब तक नहीं की
धरा जिसका इल्जाम दुनिया ने सर पर

हलो हाय होती रही रास्तों में
मिला ही न बन्दा कभी किन्तु घर पर

फ़राहम किया बस किसी ने न मरहम
जताते रहे दुःख ज़ख्मे जिगर पर

ख़ुदारा सलामत इसे तू ही रखना
बहुत हो रहे मेहरबां वो शहर पर

करें लाख कोशिश भले हुस्न वाले
रखें रोक कैसे किसी की नज़र पर

मिलगी न रहमत तेरी क्या कभी भी
रहा दे सदायें कोई कब से दर पर

बज़ा है वो सारा जो फरमा रहे वो
किसी पर न होता कोई क्यों असर पर

उसी पे इनायत रखी बिजलियों ने
मेरा आशियाना रहा जिस शजर पर

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