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ज़िंदगी की शाम ….

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Hindi Poetry

 

 ज़िंदगी की शाम ….

क्यों ज़िंदगी की शाम बेदर्द हुआ करती है
..आखिरी सांस पे चश्म ज़र्द हुआ करती है
…..धुंधला जाती हैं राहें और खो जाते हैं निशाँ
………साथ बस ख्वाहिशों की गर्द हुआ करती है

सुशील सरना

2 Comments

  1. SN says:

    bahut khoob!

  2. sushil sarna says:

    Thanks a lot Sir for ur sweet comment

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