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नहीं हिस्सा ज़िंदगी का वो…ग़ज़ल!

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Hindi Poetry

उस के एहसास में आसपास ही
यूँ तो कुछ नहीं पर हूँ ख़ास ही

वो सर उठा के नज़र डाले न डाले
दिख ही जाता हूँ उसे हूँ उजास ही

यकीं हो जिनसे वो लफ्ज़ न सबूत
उस की चुप्पियों में पढूं विश्वास ही

करे कुछ फ़ितरतों से भले परेशान
उसी से लुत्फ़ मेरा के वही रास ही

नहीं हिस्सा ज़िंदगी का वो मुक़म्मल
मगर मुझमें जिए वो बनके काश ही

~ सब्र रीत जबलपुरी

6 Comments

  1. Vikas Rai Bhatnagar says:

    Very nice…

  2. Vishvnand says:

    vaah bahut khuub aur shaandar
    gazal padh man ko bhaayii kuch khas see ….!
    Commends

  3. THE LAST HINDU says:

    मगर मुझमें जिए वो बनके काश ही….Lajawab…

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