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रूहे-सुरूर या रूहे-हलाल

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Hindi Poetry

मुझे अफ़सोस इस का नहीं कि गहरी चोट लगी है,
पर इस का कि उसे अहसास था कि मुझे चोट लगेगी।

वह कोमल-दिल है, और मैं भी हूँ नाज़ुक  मिज़ाज़,
उसे तलाशै-मरासिम है, और मेरी जुस्तजू है हकीकिये-नूर।

रस्ते अलग हैं, पर सफर एक…
सफर अनेक हैं, पर मंज़िल एक…

चन्द लम्हों का ही तो साथ है आलमे -जीस्त,
मिल के रूहे-सुरूर कर दें या रूहे-हलाल,

अभी घायल हूँ, बिखरा हूँ, खुद को समेट लेने दो,
शायद कल फिर चंद कदम किसी का हमसफ़र बनू।

2 Comments

  1. Vishvnand says:

    Badhiyaa aur manbhaavan
    Abhivaadan….
    Thanks for sharing…

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