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कर्मों का खेल

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Hindi Poetry

उस का हर झूठ, हर फरेब उसे अपने ही आप से जुदा कर रहा है,
जिस की ख़ातिर जुर्म किये, उस से ही दूरियां हो रहीं है।

वह दूसरों को गिरा कर खुद को संभला देखना चाहता था,
जो गिरे नहीं, वह उन से हर वास्ता तोड़ राहा है।

जुनूने – शौक कि वैशियत ने अन्धा कर दिया उसे,
रूहे-हुस्न में हैवानियत झलक देती है।

अभी तक वह थका नहीं, उसे अनेक जुर्म करने हैं,
इंसानियत का अभी तलक कुछ क़त्ल बाकी है।

कुदरत देख रही है, शांत  है, और  हैरत भी,
किसे क्या होना था, वह क्या होने पर आमादा है।

वह जिसे खुद-एत्मादि समझे गुरुर में है,
वह महज़ मन की एक नापाक गुलामी है ।

कर्मों के इस चक्र से कौन बाच सका है ‘विकास’,
हर एक झूठ और फरेब का हिसाब चुकाना होगा ।

4 Comments

  1. kusum says:

    Very well said. No one can escape from the clutches of Karma/Fate/Destiny.
    Kusum

  2. Vikas Rai Bhatnagar says:

    Thanks Kusumji…extracting universal principles from experiences, albeit painful ones, is one of the purpose of poetry…and shadow in humans is as real as the divinity in them. What is demonstrated at a point of consciousness-space-time and what is chosen to be perceived is what becomes a temporary reality for us. And beyond these multiple and changing realities is a fundamental Reality, by which we need to be inspired and guided.

  3. Vishvnand says:

    Sundar arthpoorn rachanaa aur andaazebayaan
    Hearty Commends

  4. Vikas Rai Bhatnagar says:

    Thanks Vishvanandji for the compliments.

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