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चाह

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Hindi Poetry

तुझ को हम तुझ ही में देखना चाहते थे,
यह कैसा मज़ाक है कि अपनी ही झलक नज़र आती है…

तुझे तेरी बेरुखी की लिए सज़ा देना चाहते थे,
यह कैसा मज़ाक है कि इस ख्याल ने खुद ही को सज़ा दे दी…

तुझे हम फ़िर्दॊस घूमना चाहते थे,
यह कैसा मज़ाक है कि इस ख्वाहिश ने खुद को ख़ुदा बना लिया …

तेरी चाह की चाहत में बस चाहते ही रह गए,
यह कैसा मज़ाक है कि उन्हें खबर तक नहीं …

4 Comments

  1. Vishvnand says:

    Achchii abhivakti, manbhaayii

    3rd stanza me shabdon ko correction kii jaroorat hai ….!

  2. Vikas Rai Bhatnagar says:

    Thank you Vishvnandji for the appreciation and also for pointing out the need for correction. I have corrected the spelling of ख्वाहिश.

  3. pallawi says:

    gud one

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