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ख़ुशी भी होती भला क्यों उमर दराज़ नहीं

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Hindi Poetry

मेरी वफ़ा का तो तुमने रखा लिहाज़ नहीं
चलो अब इस पे भी हमको तो एतराज़ नहीं

नज़र को ज़िद थी मेरी आईना सिफत होना
छुपा के रख ये सकी दिल का कोई राज़ नहीं

मरी है रुह, कि है सक़ता खिंचा शहर भर में
कहीं भी अहले सितम का है एहतिज़ाज़ नहीं

मिला है दर्द को वरदान ज्यों न मिटने का
ख़ुशी भी होती भला क्यों उमर दराज़ नहीं

न मेरा प्यार है कम कोई बादशाहों से
ये बात और बना मैं सकूंगा ताज़ नहीं

जुदा सिफ़त हैं जनाबे जदीद चारागर
उन्हें है नामे मरज़ याद पर इलाज़ नहीं

लगन लगे तो रगेजां ये झनझना उट्ठे
जो जो बेदिलों से सके बज ये ऐसा साज़ नहीं

मिटी न भूख जहालत भी ज्यों की त्यों ठहरी
स्वराज हो ये भले है मगर सुराज नहीं

2 Comments

  1. sushil sarna says:

    मिला है दर्द को वरदान ज्यों न मिटने का
    ख़ुशी भी होती भला क्यों उमर दराज़ नहीं
    न मेरा प्यार है कम कोई बादशाहों से
    ये बात और बना मैं सकूंगा ताज़ नहीं……hr ashaar men doob ke dil karta hai bas dooba hee rahoon…..gazab kee kalamgiri hai ……wah wah wah hee kahoonga aapkee is khoobsoorat gazal ke liye…..haardik badhaaee aa.Singh saahib

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