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जो मिला डेढ़ हमसे सयाना रहा

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Hindi Poetry

तुम सलामत रहो मैं रहा ना रहा
रब से हरदम हमारा मनाना रहा
आज वक़अत समझते न हो मेरी तुम
जां छिड़कते थे एक वो ज़माना रहा
दिल से अपने दिया तुमने जबसे निकाल
फिर मयस्सर कोई आसरा ना रहा
जैसे जैसे मिले अजनबीयत बढ़ी
तुमसे अच्छा ये मिलना मिलाना रहा
अब न हसरत बची हम किसी से मिलें
जो मिला डेढ़ हमसे सयाना रहा
पढ़ न पाये कभी तुम ज़ुबाने नज़र
हाल दिल का न आसां बताना रहा
सब हिसबाट बेबाक़ अपने हुए
कुछ न देना रहा कुछ न पाना रहा
बिजलियों की इनायत उसी पर हुई
शाख जिसपे मेरा आशियाना रहा
जिसमे उलझे हुए सारे अहले ख़िरद
उससे आज़ाद अक्सर दिवाना रहा
जाने क्या फैसला रोज़े महशर रहे
कौन जाहिल रहा कौन दाना रहा
फिर न सजने संवारने की चाहत बची
जब नज़र का तेरी आईना ना रहा

3 Comments

  1. Vishvnand says:

    Vaah, bahut khhuub

    kiyaa vakht aur aapne mil sitam
    na main naa n vaisaa jamaanaa rahaa …!

  2. adhakre says:

    जां छिड़कते थे एक वो ज़माना रहा
    जैसे वो पुराने दर्द का झलकना रहा
    बहुत अच्छा

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