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ख्वाब देना औ’ मुझे ख्वाब सुहाने देना

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Hindi Poetry

खस्ता हाली को नहीं मुझको सताने देना
ख्वाब देना औ’ मुझे ख्वाब सुहाने देना
क्या अजब उनने अयादत की अदा पायी है
पूछना हाल न फिर हाल बताने देना
मुल्क़ है सबका बड़े फख्र से दावा करना
एक तृण भी न बजुज़ खुद के उठाने देना
शख्स को कैसे गिरा उसकी नज़र में देते
अहले दुनिया को सिखाना ज़रा ताने देना
चलिए परवाज़ पे पाबंदी है आयद लेकिन
मुझको रह रह के मगर पंख हिलाने देना
कच्ची मिट्टी की पियाली को उठा मत लेना
कूजागर को ज़रा कुछ देर पकाने देना
तुमसे होकर के अलहदा तो ये बेमानी है
जोड़ कर खुद से मेरी ज़ीस्त को माने देना
कोई सौदा न पटा बीच में टूटे सारे
ऐ मियां सीखो संभल कर के बयाने देना
खून जज़्बात का तुमने किया तोडा दिल को
थी बड़ी बात न मस्जिद को गिराने देना
काम अपना तो है तामीर का करते रहिये
जिनको नफरत है उन्हें आग लगाने देना
उनसे उम्मीद न रख उनको फ़क़त आता है
खुद न खाना न किसी और को खाने देना

4 Comments

  1. adhakre says:

    sundar rachana

  2. Vishvnand says:

    badhiyaa andaazebayaan aur rachana…
    Manbhaayi bahut

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