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चेहरा मेरे वतन का चूहे कुतर कुतर के

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Hindi Poetry

कालिख़ जमी हुई है दीवारो दर पे घर के
है धूम बस धुएं की ढब हैं गज़ब शहर के

पहचान भी सकेगा, अपनी बनाई दुनिया
आया भी जो रचयिता आकाश से उतर के

एकबारगी पड़े हैं ओले बरस यूँ सर पे
फेंके ज्यों आसमां ने पत्थर बिफर बिफर के

अख़बार से तो उट्ठा है ऐतबार अपना
पूछें तो किससे पूछें हालात हम उधर के

मर्कूज़ जिसपे नज़रें डूबा वो काजलों में
ऐसे हटाये सबने हैं टोटके नज़र के

रखता खबर था सबकी दिन रात जो दिवाना
क़ाबिल न रह गया खुद वो अब किसी खबर के

पहचान भी है मुश्किल बदशक्ल कर गए यूँ
चेहरा मेरे वतन का चूहे कुतर कुतर के

बदले कुछ इस तरह से मीज़ान नेकोबद के
मर मर के जी रहे अब ज़िंदा जो रहते मर के

2 Comments

  1. kusumgokarn says:

    Amazed at your output.
    Almost one poem per day. On some salient topic of current times.
    Good powerful language too.
    Keep it up. Kusum

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