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“मेरी चप्पल…उसका पाप…सबका बोझ…”

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Hindi Poetry, Uncategorized

मैं मंदिर गया हरि-दर्शन कर अपने पाप धोने को…
जब लौटा तो मेरी चरण-पादुका यानी चप्पलें ग़ायब थीं…
थोड़ा यहाँ-वहाँ नज़रें दौड़ाने के पश्चात यानी बाद…
देखा कि एक युवक को चप्पलो से पीटा जा रहा था…
लगा कहीं मेरी चप्पलो का भी तो इसमें योगदान नहीं है?

गया जब पास अपने वहम की पुष्टि के लिए…
तो पता चला उसने कोई पाप किया था…
किसी सुंदर अबला के गले की चेन उसे बेचेन कर रही थी…
तो बेचारे ने अपनी बेचेनी के साथ…
अपनी ग़रीबी को भी घुसेड़ा बीच में…
और सब लगे चिल्लाने हाय क्या कर डाला इस नीच ने…
इसीलिए जनता ने उसे उसके पाप का फल देना प्रारंभ कर दिया था…

लेकिन क्या वहाँ जितने भी पाप धोने में…
उस बेचारे की सहायता कर रहे थे…
क्या अपने पाप किसी और से धुलवा चुके थे?
या किसी ने कभी कोई पाप ही नहीं किया था?

तभी मुझे एक सच्चाई समझ आई…
भाई…पापी है वही जो पकड़ा जाए…
जनता के हाथों में जकड़ा जाए…
कुछ और अघोषित पापियों द्वारा घसीटा जाए…
और जितना बोझ हमारी झुंझलाहट का है…
सारा का सारा उस पर थोप दिया जाए…

-प्रवीण

4 Comments

  1. SN says:

    bahut khoob,vicharottejak rachna

  2. Suresh Dangi says:

    Sundar Rachna. Badhaai !!!

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