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नादान परिंदे थे, सय्याद सयाना था

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Hindi Poetry

नादान परिंदे थे, सय्याद सयाना था
बन जाये जो आदत सी डाला वोही दाना था

भरमाये रहे उसकी आँखों के इशारोंसे
समझे ही न बेचारे किस ओर निशाना था

आये जो हवा देने लपटों को मेरे घर की,
खुद हाथ जला बैठे ,दामन तो बचाना था

हमदर्द हिचकते थे देने में दिलासे भी,
वो ये न समझ बैठें,मिलने का बहाना था

अफ़साना बना डाला क्यों मेरी मुहब्बत का,
यूँ कान का कच्चा है वो हमने न जाना था

हैरान रखा जिसने था एक ज़माने से
जाने था वो दर्दे दिल या दर्दे ज़माना था

कर कोई ख़ता बैठे तो माफ़ हमें करना
मक़सद तो मेरा वाहिद बस आप को पाना था

दुनिया के सरोकारों को मिलती जगह कैसे
उसमे तो तुम्ही तुम थे जिस दिल में समाना था

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