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तिलिस्म काट किसी तौर यह उदासी का

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Hindi Poetry

कहीं तो ढूंढ कोई रास्ता निकासी का
तिलिस्म काट किसी तौर यह उदासी का

खुद अपने आप से लड़ते हैं भूल दुश्मन को,
अजब है हाल हुआ अपनी बदहवासी का

डुबो वो देंगे हमें सैले शर्मसारी में
कि उनके पास महकमा है आब पाशी का

बजा रहे हैं बहरहाल ढोल आक़ा का,
निभाए जाते हैं किरदार हम मिरासी का

बरहना हो के बड़े फख्र से निकलते हैं
है रास आया उन्हें अहद बेलिबासी का

करें यूँ क़त्ल कि मक़तूल को पता न लगे
हुनर गज़ब है कुछ उनका गुलूतराशी का

न लब को सी के रहोगे तो एक दिन तय है
तुम्हारे हक़ में भी निकलेगा हुक्म फांसी का

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