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समझ कर भी रहे अनजान बनते

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Hindi Poetry

समझ कर भी रहे अनजान बनते
ख़ुदारा काश तुम ऐसा न करते

मिलीं झिझकीं झुकीं नज़रें तुम्हे यूँ
लगा पल एक मेरी जान बनते

चुकाएं भी तो हम कैसे चुकाएं
तुम्हारे हमपे सौ अहसान बनते

ज़रा सी और हमदर्दी दिखाते
मसाइल सब मेरे आसान बनते

बिकाऊ हो चली है गर दियानत
न होगी देर घर दूकान बनते

नज़र का एक इशारा ही बहुत था
हज़ारों शौक़ से दरबान बनते

बना कर ठोंकता माथा ख़ुदा है
न क्यूँ ये आदमी इंसान बनते

ज़रूरी टेढ़ क़िरदारों में बेहद
हैं सीधे कब सियासतदान बनते

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