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ग़ज़ल ये पगी है मेरी पीर में .

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Hindi Poetry

अभी रंग भरने हैं तस्वीर में
लिखा क्या न जाने है तक़दीर में.

करो वार,है दिल सलामत अभी,
बचे तीर कोई न तूणीर में.

रिहाई भला उसकी हो किस तरह
जो है बंद अपनी ही प्राचीर में.

मिले तुम बदल अर्थ इसके गए
जुदा जिन्दगी अब है तासीर में.

हुनर अपना बेहतर है खुद तक रखो
न अंतर यहाँ नीर में, क्षीर में.

रखे क़ैद लेकिन दिखायी न दे
सिफत है ये दुनियावी ज़ंजीर में,

निकलती है कम ही ज़रा म्यान से
समझ अपनों की है न शमशीर में.

है मुमकिन तुम्हे भी रसीली लगे
ग़ज़ल ये पगी है मेरी पीर में .

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