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फेर फेर मनके मिथ्या के सच का हैं करते जप वो।

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Hindi Poetry

तुर्श दिखाते तेवर, मीठा- मीठा पर करते गप वो।
फेर फेर मनके मिथ्या के सच का हैं करते जप वो।

औरों को उपदेश बघारें चारित्रिक ऊंचाई का
लखते ही ललना टपकाते लार हैं लेकिन लप लप वो।

नेतृ तत्व से या नृतत्व से जो सर्वथा विहीन रहें
चाटुकारिता में पटु हों पर, रखते ऐसे क्षत्रप वो।

जिसकी छाया में मुरझाएं सहज मनीषा के अंखुए
घेर वियत विस्तार खड़ा जो, हैं विशाल वट पादप वो।

ऐसे बलि, जो हर निरीह से बन बेहद बलवान मिलें ,
पर सशक्त वामन जब नापे, बित्तों में जाएँ नप वो।

अनाचार का भार उठायें जो सहर्ष कुछ क़ीमत ले,
ढाल बनें हर भ्रष्ट व्यक्ति का विकट वज्र वपु कच्छप वो

2 Comments

  1. Vishvnand says:

    Chaahen jitanaa naam kamaalen, maanavataa ko shraap hain vo

    Bahut badhiyaa aur maarmik …!

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