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कोई देगा क़तर ये पर महोदय

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Hindi Poetry

नमूना शख्स ठहरा हर महोदय
ये घर है या अजायबघर महोदय

हमारा पेट भरके भाषणों से
मज़े से जीमें माले तर महोदय

ये दिल्ली है उड़े ज्य़ादा यहाँ तो
कोई देगा क़तर ये पर महोदय

महोदय आप अच्छे लोकसेवक
हैं रखते लोक को अनुचर महोदय

न कूदें पार्टी दर पार्टी यूँ
न समझें लोग ये बन्दर महोदय

न लड़ के रुबरु इज्जत गिराएं
घुसा दें पीठ में खंजर महोदय

महोदय मातहत हैं आप भी क्या
कहें जिस तिस को क्योंकर सर महोदय

रचें कविता महज़ हम वीर रस में
न लीजे मांग हमसे सर महोदय

बज़ा इतनी नहीं आरामतलबी
न दे बेकार कर बिस्तर महोदय

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