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कर रहे थे देर से फूं फां बहुत

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Hindi Poetry

तंगनज़री से हुए नुकसां बहुत
आदमी दम में बने शैतां बहुत tang nazri-sankeern drishtikon,dam-kshan

भीड़ में चल तो रहा दिन रात पर
लग रहा माहौल है वीरां बहुत

छोड़ दी पूरी तरह शर्मो हया
जब शहर ने कर दिया उरयां बहुत uryan-nagn,naked

जिस तरफ देखो गिरे दो चार हैं,
क्या इधर सस्ते हैं जिस्मो जां बहुत

आईना देखा तो चुप्पी साध ली
कर रहे थे देर से फूं फां बहुत

काठ की हांड़ी दुबारा कब चढ़ी,
जानते हैं आपको खूबां बहुत khoobaan-duniya vale

छोड़िये खुलवाएं मत मुंह, आप के
मुझपे, लेता मान, हैं अहसां बहुत

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