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चौथ के चंद्रमा का मन भी ललचता है

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चौथ के चंद्रमा का मन भी ललचता है
रूप मे जो तेरे आज एक नूर बरसता है।

karvaछननी का परदा आज दरमियाँ जो है
बे परदा तुझे देखने चांद भी तरसता है।

हैरान है आकाश देख के धरा पे रोशनी
माथे पे सुहाग का टीका जो दमकता है।

कानों मे आकर रस घोल जाती है पवन
कलाईयों पे तेरे कंगना जो खनकता है।

शायद तेरे ही श्रृंगार से ईर्ष्या है चांद को
तभी तुझे चिढ़ाने वो देर से निकलता है।

तेरे कठिन व्रत के आगे झुकती कायनात
सत्य सावित्री से तो यम भी लरजता है। (लरजना =भयभीत होना )

सुरेश राय ‘सुरS’

(चित्र गूगल से साभार )

4 Comments

  1. s n singh says:

    achchhi lagi, parantu shayad beparda ko ve parda likh diya aapne!

  2. Suresh Dangi says:

    Badhaai !!!

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